NCR-Delhi: Looking for affordable housing?

दिल्ली में अफोर्डेबल हाउसिंग
4 Feb 2011, 0400 hrs IST,हेलो दिल्ली

इन दिनों दिल्ली-एनसीआर में किन जगहों को सबसे ज्यादा संभावनाओं वाली जगहों के रूप में देख रहे हैं? खासतौर पर अफोर्डेबल हाउसिंग के नजरिए से।

संयोग से दिल्ली-एनसीआर में कई जगहें अफोर्डेबल हाउसिंग के नजरिए से काफी संभावनाओं वाली हैं। इनमें नोएडा एक्सटेंशन, राजनगर एक्सटेंशन, नोएडा सेक्टर 21, 75, क्रॉसिंग रिपब्लिक, इंदिरापुरम आदि शामिल हैं। कम बजट के हिसाब से बात करें, तो इस समय नोएडा एक्सटेंशन, राजनगर एक्सटेंशन और क्रॉसिंग रिपब्लिक सबसे बेहतर चॉइस हैं। हायर मिडल क्लास के लिए इंदिरापुरम अच्छा इलाका रहेगा, क्योंकि वह इन सभी जगहों में सबसे ज्यादा विकसित है। वहां 2 बेडरूम अपार्टमेंट की कीमत 35-40 लाख रुपये है। इससे कम की चाह रखने वाले नोएडा एक्सटेंशन या राजनगर एक्सटेंशन जा सकते हैं, जहां 2 बेडरूम अपार्टमेंट 15-20 लाख रुपये तक आसानी से मिल जाएगा।

अगर इन जगहों की विशेषताओं के बारे में पूछें, तो?
सभी जगहों में खास अंतर अलग-अलग जगहों से नजदीकियों का है। राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद मुख्य शहर से लगा हुआ है, तो नोएडा एक्सटेंशन ग्रेटर नोएडा और नोएडा दोनों के पास है। वहीं, इंदिरापुरम दिल्ली के बेहद नजदीक है। नोएडा एक्सटेंशन में स्कूल, अस्पताल, शॉपिंग मॉल, एजुकेशनल इंस्टिट्यूट्स, मेट्रो जैसी बेसिक सुविधाएं 5 से 10 किलोमीटर ही उपलब्ध हैं। यह इलाका ग्रेटर नोएडा में होने के कारण ग्रेनो की तरह अच्छी तरह प्लान किया जा रहा है। यहां 135 मीटर चौड़ी सड़कें हैं। वहीं, गाजियाबाद के नए इलाकों में बेसिक सुविधाओं से नजदीकी तो है, लेकिन गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के अंतर्गत होने के कारण तंग सड़कों जैसी कुछ मूल समस्याएं भी हैं।

फ्लैट बेचते समय जो एरिया बताया जाता है, क्या वास्तव में वह फ्लैट का ही एरिया होता है?
देखिए, तीन तरह के एरिया होते हैं। कारपेट एरिया, कवर्ड एरिया और सुपर एरिया। कारपेट एरिया फ्लैट के अंदर वह जगह है, जिस पर आप कारपेट बिछा सकें, यानी इसमें दीवारें शामिल नहीं होतीं। कवर्ड एरिया में कारपेट एरिया + दीवारें और बालकनी की जगह शामिल होती है, जबकि सुपर एरिया में सोसाइटी के अंदर साझा इस्तेमाल की चीजें भी शामिल कर ली जाती हैं, जैसे – लिफ्ट, जेनरेटर रूम, पार्क, पार्किंग, लॉबी आदि। फ्लैट का साइज दरअसल, सुपर एरिया होता है, जिसमें कवर्ड एरिया और सुपर एरिया की जगहें जोड़ी जाती हैं। सुपर एरिया कवर्ड एरिया का लगभग 20 प्रतिशत होता है, जिसे कवर्ड एरिया का लोडिंग फैक्टर कहा जाता है। मान लीजिए, फ्लैट का कवर्ड एरिया 1000 स्क्वेयर फीट है और सुपर एरिया 200 स्क्वेयर फीट, तो फ्लैट का साइज 1200 स्क्वेयर फीट कहा जाएगा। इसे ‘सेलेबल एरिया’ भी कहा जाता है।

क्या फ्लैट के एरिया के अलावा जगह की भी कीमत वसूल करना उचित है?
बिल्कुल। बिल्डर को किसी भी प्रॉजेक्ट में केवल 20 प्रतिशत जगह पर ही कंस्ट्रक्शन करने की अनुमति होती है। यह सही है कि पहली नजर में इस 20 प्रतिशत जगह की कीमत वसूल करने की ही बात सही लगती है, लेकिन बाकी 80 प्रतिशत जगह का इस्तेमाल भी कंस्यूमर ही इस्तेमाल करते हैं। इन जगहों को रेगुलर मेंटिनेंस की भी जरूरत होती है, जिसके लिए लगातार पैसे भी चाहिए। बिल्डर ग्राहकों से केवल थोड़ा-सा शेयर ही लेते हैं।

आपने मेंटिनेंस की बात की। सोसाइटी मेंटिनेंस भी काफी ज्यादा होता है। इसे तय करने का क्या आधार होता है?
मेंटिनेंस कॉस्ट सोसाइटी में दी जाने वाली सुविधाओं पर निर्भर करती है। जितनी लग्जरी सुविधाएं होंगी, मेंटिनेंस कॉस्ट उतनी ही ज्यादा होगी। अगर सोसाइटी में फ्लैटों की संख्या ज्यादा है, तो प्रति फ्लैट मेंटिनेंस चार्ज कम हो जाएगा, नहीं तो अच्छी-खासी रकम मेंटिनेंस कॉस्ट के रूप में देनी पड़ेगी। प्री-लॉन्च के समय बुकिंग कराने पर आमतौर पर इंटरेस्ट फ्री वन टाइम मेंटिनेंस चार्ज लिया जाता है, जिसे पजेशन के समय जमा कराना पड़ता है। इसके बाद कुछ बरसों तक यह चार्ज नहीं देना पड़ता। सोसाइटी में रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन बन जाने के बाद मेंटिनेंस फंड एसोसिएशन को ट्रांसफर कर दिया जाता है। इस फंड के इनवेस्टमेंट से मिलने वाले इंटरेस्ट से भी मेंटिनेंस का काफी खर्च निकल जाता है।

प्री-लॉन्च में फ्लैट बुक कराते समय क्या सावधानियां रखनी चाहिए?
प्री-लॉन्च के समय में आपके सामने धरातल पर कुछ नहीं होता, इसलिए बिल्डर के ट्रैक रिकॉर्ड को सावधानी से जांच-परख लेना जरूरी होता है। इसके अलावा, यह भी देख लें कि कोई अच्छा फाइनैंशल इंस्टिट्यूशन उस प्रॉजेक्ट को फाइनैंस कर रहा हो और उस पर आसानी से लोन भी उपलब्ध हो। जमीन के मालिकाना हक की जांच करना भी बहुत जरूरी होता है। यह सुनिश्चित कर लें कि उस जमीन का मालिकाना हक बिल्डर के ही पास हो। इसके अलावा बाकी सभी सटिर्फिकेट्स भी हासिल कर लिए गए हैं।

प्रॉजेक्ट्स के विज्ञापनों में किसी खास बैंक या फाइनैंस कंपनी से होम लोन उपलब्ध कराने की बात लिखी जाती है, इसका क्या मतलब होता है?
इसका मतलब यह होता है कि उस डिवेलपर ने संबंधित इंस्टि्यूशन से प्रॉजेक्ट पर लोन देने के लिए टाईअप किया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उस प्रोजेक्ट पर कहीं और से फाइनैंस नहीं मिलेगा। दरअसल, उस कंपनी या बैंक से होम लोन लेने पर ग्राहकों को आसानी होती है और उनका काम जल्दी हो जाता है, क्योंकि बैंक के पास डिवेलपर की फाइल पहले ही तैयार होती है, जिसमें प्रोजक्ट की डिटेल्स, उसकी जांच की रिपोर्ट, लैंड टाइटिल की जांच रिपोर्ट, फाइनैंशल हालात आदि को लेकर बैंक पहले ही संतुष्ट हो चुका होता है। अब बैंक को केवल कंस्यूमर के लेवल पर संतुष्ट होकर लोन पास करना बाकी रह जाता है।

अभी प्रॉपर्टी की कीमतों में और कितना उछाल आ सकता है?
बिल्डिंग मटीरियल की कॉस्ट लगातार बढ़ रही है, जगह-जगह सर्कल रेट भी बढ़ रहे हैं, ऐसे में अगले छह महीनों में सभी तरह की प्रॉपटीर्ज की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

इधर, होम लोन एक बार फिर महंगे हो रहे हैं। क्या इसका असर प्रॉपर्टी की कीमतों या डिमांड पर पड़ सकता है?
आज का कन्ज़यूमर काफी स्मार्ट हो गया है। वह जानता है कि आज होम लोन महंगे हैं, तो कल इनके सस्ते होने का लाभ भी उन्हें ही मिलेगा।

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7419528.cms

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: